A very old poem of mine, just got from childhood dairy…

शायद इसमे मेरा बचपन झलकता है…

आओ बच्चो, आओ बच्चो कम कम कम…
पड़ने मे लगाओ तुम अपना मन

खेलो ज़रा तुम अब, कम कम कम
मूवी मे न लगाओ तुम अपना मन

मैडम मुझको रोज देती सम सम सम
लगाने मे उनको मेरा, निकल जाता है दम

प्रतिदिन जब मैं करता हू ये, सम सम सम..
बच्चे कहते बाहर से आ मिल के खेले हम

अंदर से मैं कहता हूँ ना करो मुझे तंग!!

अरविंद कुमार भारद्वाज

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