ये कैसा समय आया है अपने आप को अपने आप मे ही नही पाता हूँ

पता नही अनायास ही किसी के ख़यालो मे खो जाता हूँ

समय की उपयोगिता का मुझे अहसास भी है
ख़यालो से निकले का मेरा अच्छा प्रयास भी है

पर शायद ख़यालो की सुंदरात के आगे समय की उपयोगिता फीकी पड़ रही है
शायद इसी कारण से मेरी चिंता और भी बढ़ रही है

चिन्ताओ के बढ़ने पर प्राब्लम को सॉल्व नही कर पाऊगा
विपदाओ के बढ़ने पर उसे देखता ही रह जाऊगा

तभी जहन मे एक नया ख़याल आता है
ख़यालो से निकले का एक नया ख़याल आता है

यह क्या है, एक छलावा है या एक धोखा है
या मेरे ख़यालो ने मुझे छलने का एक नया ख़याल सोचा है

पर डिटर्माइनॅंट अरविंद ने एन ख़यालो से निकलने का एक नया ख़याल सोचा है
अपने लक्ष एवं शुभ शंकल्पो की पुश्तिका को पड़ने का विचार सोचा है

पर सोचता हू मुझे अति सीघ्र, इन् ख़यालो की दुनिया से निकलने का दूसरा निदान करना होगा
शायद इन् ख़यालो के बीच मे, घड़ी को देखने का प्रावधान करना होगा

अरविंद कुमार भारद्वाज

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